Tuesday, July 15
मेरा गाँव मेरा देश !
इस साल भी हम चम्पानगर जून के महीने में आए हैं । ३० साल से यही अभयान चल रहा है। भारत के किसी भी कोने में हम रहते रहें , पर गर्मी में गाँव ज़रूर चले आते हैं। शादी के पहले कुछ साल तक गाँव आना एक भार लगता था। आख़िर वह मेरा ससुराल जो था।
पर अब यह गाँव अपना लगता है।
चम्पानगर गाँव ,पुर्नेया जिला , बिहार ।
बहुत ही खुबसूरत है हमारी ड्योढी ।
राजा कृत्यानंद , और उनसे पहले उनकी माँ , मायाजी का बसाया। सेमल ,अनानास ,नीबू, चीकू, लीची, नारियल, तेजपात, हींग, जामुन, फालसा , अमरुद , और जाने कौन कौन से पेड़ यहाँ उगते है।
अनेक विशाल और गहरे पोखर में तैरती सुनहरी मछलियाँ हैं यहाँ ।
आम लीची के बगीचों के बीच बनी द्दोहरी का आलम ही कुछ और है।
सास बतलाती हैं की , अभी तो कुछ भी नही है , जब वो बहु बन कर आयीं थी यहाँ, तब ड्योढी अमरावती से कम खुबसूरत नही था ।कौन नही जानता था बनैली स्टेट का एअश्वर्य तब । राजा साहेब का इतना रॉब था की सब अपनी बेटियाँ बनैली में ब्याहना चाहते थे। चंपा , चमेली, मोगरा, गुलाब कमल, हरसिंगार, रात की रानी और बहुत से फूलों से लादे बगीचों में रंग बिरंगे फुवारे चलते थे । सब बहुएँ , और उनके देवर इनमे खेलते थे।
मायाजी की बारी , जो सब से सुंदर मानी जाती थी, उसका एक अंश ,मेरे पति को विरासत में मिली है। पर मैंने तो उसे बस जंगल की तरह ही देखा है। घनी बेल और लतर से ढके आम और लीची के पेड़ भी छिप गए थे। विषैले सांप और बिच्छू के डर से कोई उसमे गुस्ता भी नही था । बड़ी मुश्किल से " जोन " बुलाकर सफाई हर साल बस हो जाती थी।
पूर्वजो की बनायी विरासत नष्ट हो रही थी।
पर अब कुछ एक सालों से एक नया दौर आ गया है।
ड्योढी मैं फिर से बहार आ रही है- हौले हौले!।
नयी पीढी के लोग , जिन्होंने पिछला कुछ नही देखा है , विरासत को खोना नही चाहते। बल्कि उसमे चार चाँद लगाना चाहते हैं। देश विदेश में रहेने वाले, और अंग्रेज़ी स्कूल में पढने वाले हमारे पुत्र , उनकी वधु , और हमारी लाडली पुत्रियाँ द्दोहरी के पुनर निर्माण में योगदान देना चाहते हैं । किसी भी परिवार के लिए ऐसा होना शुभ भाग्य है।
लहलहाती और खुशनुमा रहे हमारी ड्योढी ।
आबाद रहें हमारे गाँव ! हमारा देश ।
पर अब यह गाँव अपना लगता है।
चम्पानगर गाँव ,पुर्नेया जिला , बिहार ।
बहुत ही खुबसूरत है हमारी ड्योढी ।
राजा कृत्यानंद , और उनसे पहले उनकी माँ , मायाजी का बसाया। सेमल ,अनानास ,नीबू, चीकू, लीची, नारियल, तेजपात, हींग, जामुन, फालसा , अमरुद , और जाने कौन कौन से पेड़ यहाँ उगते है।
अनेक विशाल और गहरे पोखर में तैरती सुनहरी मछलियाँ हैं यहाँ ।
आम लीची के बगीचों के बीच बनी द्दोहरी का आलम ही कुछ और है।
सास बतलाती हैं की , अभी तो कुछ भी नही है , जब वो बहु बन कर आयीं थी यहाँ, तब ड्योढी अमरावती से कम खुबसूरत नही था ।कौन नही जानता था बनैली स्टेट का एअश्वर्य तब । राजा साहेब का इतना रॉब था की सब अपनी बेटियाँ बनैली में ब्याहना चाहते थे। चंपा , चमेली, मोगरा, गुलाब कमल, हरसिंगार, रात की रानी और बहुत से फूलों से लादे बगीचों में रंग बिरंगे फुवारे चलते थे । सब बहुएँ , और उनके देवर इनमे खेलते थे।
मायाजी की बारी , जो सब से सुंदर मानी जाती थी, उसका एक अंश ,मेरे पति को विरासत में मिली है। पर मैंने तो उसे बस जंगल की तरह ही देखा है। घनी बेल और लतर से ढके आम और लीची के पेड़ भी छिप गए थे। विषैले सांप और बिच्छू के डर से कोई उसमे गुस्ता भी नही था । बड़ी मुश्किल से " जोन " बुलाकर सफाई हर साल बस हो जाती थी।
पूर्वजो की बनायी विरासत नष्ट हो रही थी।
पर अब कुछ एक सालों से एक नया दौर आ गया है।
ड्योढी मैं फिर से बहार आ रही है- हौले हौले!।
नयी पीढी के लोग , जिन्होंने पिछला कुछ नही देखा है , विरासत को खोना नही चाहते। बल्कि उसमे चार चाँद लगाना चाहते हैं। देश विदेश में रहेने वाले, और अंग्रेज़ी स्कूल में पढने वाले हमारे पुत्र , उनकी वधु , और हमारी लाडली पुत्रियाँ द्दोहरी के पुनर निर्माण में योगदान देना चाहते हैं । किसी भी परिवार के लिए ऐसा होना शुभ भाग्य है।
लहलहाती और खुशनुमा रहे हमारी ड्योढी ।
आबाद रहें हमारे गाँव ! हमारा देश ।
Saturday, April 26
Strokes
Your words combed
my tangled thoughts
then poured
down the slopes
and I rested
as if after
a warm
oil bath.
Monsoon
Mighty Shiva
Dark expanding
Lightening Parvati
Deep entwining
( published)
Let Be
Let the breeze
sweep clean
mounds of sepia tinted leaves
that lie around ,
not knowing why
on hardened ground.
Let the new rain
soften terrain,
so that spring
waiting in the wings
can walk free
barefeet.
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