Sunday, June 28

स्वरण किरण


कुल सधे सात महीने बाद मैं ड्योढी गयी। मई के अंत से जून के प्रारम्भ तक थी वहाँ -एक आनंद भरा आराम का वातावरण था । लप टॉप पर काम , बहुत दिनों से बंद पडी अलमारियों की झाड़ सफाई , और अचार , मुरब्बा बनाने मैं दिन बसरता । स्टाफ कुशल होता है, तो छुटी का मज़ा और हैं। बाकी समय जेठानियों से गप मारने मैं जाता। एक अदद सास मौजूद थी, और मैं रोजाना उन से आर्शीवाद लेने पहुच जाती। दशमी से बिल्कुल अलग है गर्मी का आलम ड्योढी में। एक अनोखा आलस्य छाया रहता हैं, आम और लीत्ची के रस में , हम सब का एक आड़ किलो वज़न बढ ही जाता है। कोई चहल पहल नही, न पूजा की रस्म के लिए सुबह शाम भारी साड़ी और गहनों से सवरना, और न ही दुनिया भर के पकवान बनते है , जैसे की दसमी के उत्सव में होता है।


गाँव में साधारण चीज़ें असाधारण हो जाती हैं । दो दिन, मैंने अपने तीन जेठों को इंग्लिश ब्रेअक्फास्त कराया- चीज़ ओमेलेत्ते , हेम तोअस्त , और कोल्ड काफ़ी। जितना सबने एन्जॉय किया , शायद , शहर में यह सब परोसती तो कोई ध्यान भी नही देता। इन्ही सब प्रत्किक्रियाँ में समय व्यतीत हुआ।


पर हमारे सात जेठ बहुत बिजी थे । दिन भर मीटिंग , विचार विमश, और थोडी बहुत पत्नेयों से सलाह लेने के बाद ऐसा कुछ किया, की चम्पानगर ड्योढी में एक नया इतिहास रचा । एक निश्चय किया की पूजा ट्रस्ट का कार्य और कुशलता से किया जाएगा। चम्पानगर बाज़ार को आयोजित , और आदर्श बनाया जाएगा, और कम्युनिटी में पुनः बनिल्ली राज को प्रथिष्ट किया जाएगा ।


यह सब केवल बातें ही नही थीं।बहुत सारा काम भी हुआ है। पुराने कागज़ जमा हुए , सात भाइयों ने गाँव का निरिक्षर्ण किया, वासियों से बात करी , उनकी परेशानेयाँ समझी। ड्योढी के इतिहास में सदियों बाद एक स्वर्ण किरण उगी है। हम सब उत्सुक हैं , गाँव से जुड़ने के लिए। गाँव उन्नति करेंगे तब ही शहर सुधरेंगे। हमारा गाँव ही है हमारा देश ।

Tuesday, July 15

मेरा गांव मेरा देश - चम्पानगर -ड्योढी

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मेरा गाँव मेरा देश !

इस साल भी हम चम्पानगर जून के महीने में आए हैं । ३० साल से यही अभयान चल रहा है। भारत के किसी भी कोने में हम रहते रहें , पर गर्मी में गाँव ज़रूर चले आते हैं। शादी के पहले कुछ साल तक गाँव आना एक भार लगता था। आख़िर वह मेरा ससुराल जो था।

पर अब यह गाँव अपना लगता है।
चम्पानगर गाँव ,पुर्नेया जिला , बिहार ।
बहुत ही खुबसूरत है हमारी ड्योढी ।

राजा कृत्यानंद , और उनसे पहले उनकी माँ , मायाजी का बसाया। सेमल ,अनानास ,नीबू, चीकू, लीची, नारियल, तेजपात, हींग, जामुन, फालसा , अमरुद , और जाने कौन कौन से पेड़ यहाँ उगते है।
अनेक विशाल और गहरे पोखर में तैरती सुनहरी मछलियाँ हैं यहाँ ।
आम लीची के बगीचों के बीच बनी द्दोहरी का आलम ही कुछ और है।

सास बतलाती हैं की , अभी तो कुछ भी नही है , जब वो बहु बन कर आयीं थी यहाँ, तब ड्योढी अमरावती से कम खुबसूरत नही था ।कौन नही जानता था बनैली स्टेट का एअश्वर्य तब । राजा साहेब का इतना रॉब था की सब अपनी बेटियाँ बनैली में ब्याहना चाहते थे। चंपा , चमेली, मोगरा, गुलाब कमल, हरसिंगार, रात की रानी और बहुत से फूलों से लादे बगीचों में रंग बिरंगे फुवारे चलते थे । सब बहुएँ , और उनके देवर इनमे खेलते थे।

मायाजी की बारी , जो सब से सुंदर मानी जाती थी, उसका एक अंश ,मेरे पति को विरासत में मिली है। पर मैंने तो उसे बस जंगल की तरह ही देखा है। घनी बेल और लतर से ढके आम और लीची के पेड़ भी छिप गए थे। विषैले सांप और बिच्छू के डर से कोई उसमे गुस्ता भी नही था । बड़ी मुश्किल से " जोन " बुलाकर सफाई हर साल बस हो जाती थी।

पूर्वजो की बनायी विरासत नष्ट हो रही थी।
पर अब कुछ एक सालों से एक नया दौर आ गया है।
ड्योढी मैं फिर से बहार आ रही है- हौले हौले!।
नयी पीढी के लोग , जिन्होंने पिछला कुछ नही देखा है , विरासत को खोना नही चाहते। बल्कि उसमे चार चाँद लगाना चाहते हैं। देश विदेश में रहेने वाले, और अंग्रेज़ी स्कूल में पढने वाले हमारे पुत्र , उनकी वधु , और हमारी लाडली पुत्रियाँ द्दोहरी के पुनर निर्माण में योगदान देना चाहते हैं । किसी भी परिवार के लिए ऐसा होना शुभ भाग्य है।

लहलहाती और खुशनुमा रहे हमारी ड्योढी ।
आबाद रहें हमारे गाँव ! हमारा देश ।