
कुल सधे सात महीने बाद मैं ड्योढी गयी। मई के अंत से जून के प्रारम्भ तक थी वहाँ -एक आनंद भरा आराम का वातावरण था । लप टॉप पर काम , बहुत दिनों से बंद पडी अलमारियों की झाड़ सफाई , और अचार , मुरब्बा बनाने मैं दिन बसरता । स्टाफ कुशल होता है, तो छुटी का मज़ा और हैं। बाकी समय जेठानियों से गप मारने मैं जाता। एक अदद सास मौजूद थी, और मैं रोजाना उन से आर्शीवाद लेने पहुच जाती। दशमी से बिल्कुल अलग है गर्मी का आलम ड्योढी में। एक अनोखा आलस्य छाया रहता हैं, आम और लीत्ची के रस में , हम सब का एक आड़ किलो वज़न बढ ही जाता है। कोई चहल पहल नही, न पूजा की रस्म के लिए सुबह शाम भारी साड़ी और गहनों से सवरना, और न ही दुनिया भर के पकवान बनते है , जैसे की दसमी के उत्सव में होता है।
गाँव में साधारण चीज़ें असाधारण हो जाती हैं । दो दिन, मैंने अपने तीन जेठों को इंग्लिश ब्रेअक्फास्त कराया- चीज़ ओमेलेत्ते , हेम तोअस्त , और कोल्ड काफ़ी। जितना सबने एन्जॉय किया , शायद , शहर में यह सब परोसती तो कोई ध्यान भी नही देता। इन्ही सब प्रत्किक्रियाँ में समय व्यतीत हुआ।
पर हमारे सात जेठ बहुत बिजी थे । दिन भर मीटिंग , विचार विमश, और थोडी बहुत पत्नेयों से सलाह लेने के बाद ऐसा कुछ किया, की चम्पानगर ड्योढी में एक नया इतिहास रचा । एक निश्चय किया की पूजा ट्रस्ट का कार्य और कुशलता से किया जाएगा। चम्पानगर बाज़ार को आयोजित , और आदर्श बनाया जाएगा, और कम्युनिटी में पुनः बनिल्ली राज को प्रथिष्ट किया जाएगा ।
यह सब केवल बातें ही नही थीं।बहुत सारा काम भी हुआ है। पुराने कागज़ जमा हुए , सात भाइयों ने गाँव का निरिक्षर्ण किया, वासियों से बात करी , उनकी परेशानेयाँ समझी। ड्योढी के इतिहास में सदियों बाद एक स्वर्ण किरण उगी है। हम सब उत्सुक हैं , गाँव से जुड़ने के लिए। गाँव उन्नति करेंगे तब ही शहर सुधरेंगे। हमारा गाँव ही है हमारा देश ।