मंथन
न जाने क्यों ,
जीवन लगता है भंवर,
घूम रहें है बार बार
हम एक ही पथ पर।
जो बातें हैं करते,
और उन के पीछे इरादे,
क्यों लगते हैं अक्सर
बेफिसूल, बेअसर?
है ये चक्राव्यु !
गिरोह मैं जिसकी
कौन हो सकता है कभी
सम्पूर्ण और मुकत !
बस करना है सफ़र,
अपने ही परों पर ,
सहारों से दूर
दर को भूल।
किनी लगती है कठोर
करके ये बातें।
क्यो नही हो सकता मधुर ,
जीवन ! रह कर कमजोर?
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1 comment:
I cannot read Hindi unfortunately…I will have to have this translated at some point (…as I was eager to read this; looking at the rest of your wonderful poetry). Alas…
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